बहुत वर्ष पहले की बात है, जब भारत में नया-नया टेलीविजन आया था और केवल दूरदर्शन ही एकमात्र प्रसारण माध्यम था। उस समय दिखाए जाने वाले सीरियल और कार्यक्रम समाज कल्याण तथा देश की उन्नति को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे। उन्हीं कार्यक्रमों में एक कहानी प्रसारित हुई थी, जो आज भी हमें सोचने पर मजबूर करती है।
एक बूढ़ा व्यक्ति घूमते-घूमते मुंबई के चोर बाजार पहुँच जाता है। वहाँ एक भंगार की दुकान में उसे एक पुराना चष्मा पसंद आ जाता है। वह चष्मा साधारण नहीं, बल्कि चमत्कारिक होता है। जैसे ही वह चष्मा पहनता है, वह सामने वाले व्यक्ति के दिल के अंदर चल रही बातें सुनने लगता है।
जब वह घर पहुँचता है, तो बेटी बाहर जाने के लिए तैयार होती है।
बेटी मीठे स्वर में कहती है “मैं सहेली के घर जा रही हूँ।”
लेकिन चष्मा पहनते ही उसके मन की आवाज सुनाई देती है
“इस बूढ़े को अभी ही आना था क्या? मुझे तो अपने प्रेमी से मिलने जाना है।”
फिर वह बेटे से बात करता है। बेटा ऊपर से नम्रता और आदर से बात करता है,
पर मन ही मन पिता के लिए गलत और अपमानजनक बातें सोच रहा होता है।
उस व्यक्ति ने पहली पत्नी के देहांत के बाद कम उम्र की दूसरी पत्नी से विवाह किया था।
पत्नी ऊपर से प्रेम और आदर दिखाती है,
लेकिन अंदर ही अंदर किसी और से संबंध होने के कारण
पति को अनाप-शनाप बातें कह रही होती है।
जब वह व्यक्ति इस चष्मे की सच्चाई सबको बताने की कोशिश करता है,
तो परिवार वाले मिलकर उसे पागल घोषित कर देते हैं
और उसे पागलखाने भिजवा देते हैं।
आज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई है।
आज भले हमारे पास सच्चाई दिखाने वाला चष्मा नहीं है,
लेकिन अगर कोई व्यक्ति
धर्म की सच्चाई,
समाज की सच्चाई,
राजनीतिक नेताओं की सच्चाई,
किसी पार्टी की सच्चाई,
किसी ऑफिस की सच्चाई
या अपने ही परिवार की सच्चाई
अगर खुलकर बोलने की हिम्मत करता है,
तो उसे पागल नहीं,
लेकिन तरह-तरह से परेशान जरूर कर दिया जाता है।
कभी बदनाम करके,
कभी अकेला करके,
कभी डराकर,
तो कभी मजबूर करके
उसे चुप करा दिया जाता है।
अंत में हालत यह हो जाती है कि
वह व्यक्ति गलत बातें देखता भी है
और सहता भी है,
लेकिन बोल नहीं पाता।
यह कहानी हमें एक बहुत बड़ा सबक देती है
समस्या सच्चाई में नहीं है,
समस्या सच्चाई सहने की हमारी ताकत में है।
अगर समाज को सच सुनना बुरा लगता है,
तो समझ लो समाज बीमार हो रहा है।
अगर गलत को गलत कहने वाला परेशान किया जाता है,
तो समझ लो व्यवस्था कमजोर हो चुकी है।
आज जरूरत है
चष्मे की नहीं,
बल्कि हिम्मत की।
हिम्मत सच बोलने की,
हिम्मत गलत के खिलाफ खड़े होने की,
और हिम्मत यह मानने की
कि सुधार तभी होगा
जब हम सच का सामना करेंगे।
जागो समाज, जागो देश!
सच्चाई से भागने से अंधेरा बढ़ता है,
और सच्चाई स्वीकार करने से ही उजाला होता है।
आज नहीं बोले,
तो कल बोलने का अधिकार भी नहीं बचेगा।
और जो समाज सच बोलने वालों को पागल समझने लगे,
वह समाज खुद धीरे-धीरे मरने लगता है।
सच्चाई कड़वी जरूर होती है,
लेकिन वही सबसे बड़ी दवा होती है।
– राजेंद्र सिंघ शाहू
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