सादर प्रणाम।
सबसे पहले आपको श्री गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी पर्व में आपके द्वारा अच्छी तरह से कीये गये कार्य की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सर जी, हाल ही में श्री गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी पर्व के अवसर पर आपको निकट से देखने और आपके विचार सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। सच कहूँ तो आपसे मिलने से पहले आपके प्रति मेरे मन में एक अलग धारणा थी, परंतु आपके विचार सुनने के बाद मेरी सोच पूरी तरह बदल गई। आपके व्यक्तित्व में धार्मिक आस्था, विद्वता, सकारात्मक सोच तथा समाजहित में कार्य करने की भावना स्पष्ट दिखाई दी। इसी विश्वास के कारण मैं आपसे कुछ विनम्र बातें साझा करना चाहता हूँ।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा वर्तमान सचखंड गुरुद्वारा बोर्ड अधिनियम, 1956 को पूर्णतः समाप्त कर नया कानून लाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस विषय में आपका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है अथवा नहीं, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। किंतु कल सोशल मीडिया एवं फेसबुक पर आपको महाराष्ट्र के महसूल मंत्री श्री बावनकुळे जी, दमदमी टकसाल के मुखी बाबा हरनाम सिंघ जी तथा आपके दो अन्य साथियों के साथ इस विषय पर चर्चा करते हुए देखा। चर्चा किस विषय पर हुई, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो सका।
सर जी, सचखंड श्री हजूर साहिब की मर्यादा, परंपरा, इतिहास और धार्मिक स्वरूप संपूर्ण विश्व में अद्वितीय है। इसे केवल पढ़कर या सुनकर नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसे वही वास्तव में अनुभव कर सकता है जिसके पूर्वज श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज के समय से मराठवाड़ा और तेलंगाना की इस पवित्र भूमि से जुड़े रहे हैं। यहाँ की परंपराएँ केवल धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि साढ़े तीन सौ वर्षों से चली आ रही जीवंत विरासत हैं।
दमदमी टकसाल के मुखी होने के नाते बाबा हरनाम सिंघ जी का सम्पूर्ण सिक्ख समाज सम्मान करता है। किंतु महाराष्ट्र में आकर यदि धार्मिक विषयों को राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया जाता है, तो उससे केवल हजूर साहिब ही नहीं बल्कि विश्वभर की संगत में भी अनेक प्रकार की शंकाएँ और प्रश्न उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार आपके साथ उपस्थित कुछ लोग, जो स्वयं को सिक्ख समाज का प्रतिनिधि बताते हैं, वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए मुख्यमंत्री अथवा महाराष्ट्र सरकार को वास्तविक परिस्थिति से भिन्न जानकारी देकर गलत मार्गदर्शन कर रहे हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहना समय की आवश्यकता है।
सर जी, मैं आपके समक्ष हजूर साहिब की कुछ ऐसी विशेषताएँ रखना चाहता हूँ, जो शायद बाहर के लोगों के लिए समझना आसान नहीं है—
1. सचखंड गुरुद्वारे में बंजारा एवं लभाना समाज के नवविवाहित दूल्हा-दुल्हन विवाह के पश्चात दर्शन के लिए आते हैं तो उनका एवं उनके परिवार का गुरु महाराज के सिरोपाव देकर सम्मान किया जाता है।
2. सचखंड सिक्ख हॉस्टल में बंजारा एवं लभाना समाज के विद्यार्थियों को निःशुल्क रहने, भोजन तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
3. बाबा फतेह सिंघ जी मंगल कार्यालय में बंजारा, लभाना एवं सिंधी समाज को भी सिक्ख समाज की तरह विशेष रियायतें प्रदान की जाती हैं।
4. बंजारा एवं लभाना समाज के बच्चों के लिए धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ सामान्य विद्यालयीन शिक्षा, आवास, भोजन तथा उत्कृष्ट रागी और कथावाचक बनने की सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
5. पोहरादेवी यात्रा के दौरान आने वाले बंजारा एवं लभाना समाज का विशेष स्वागत किया जाता है तथा उन्हें हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
6. पोहरादेवी यात्रा के अवसर पर सचखंड गुरुद्वारा बोर्ड की ओर से विशेष लंगर सेवा संचालित की जाती है।
7. हजूर साहिब का स्थानीय सिक्ख समाज जाति, धर्म और समाज से ऊपर उठकर सभी समुदायों के साथ भाईचारे, सेवा और प्रेम की परंपरा निभाता आया है। यही इस पवित्र स्थान की वास्तविक पहचान है।
सर जी, जिन लोगों की सोच केवल आर्थिक लाभ, व्यवसाय या सत्ता तक सीमित है, वे इन परंपराओं की आत्मा को कभी समझ नहीं सकते और न ही इन्हें आगे बढ़ा सकते हैं। यह सब इसलिए संभव है क्योंकि हजूर साहिब और मराठवाड़ा का सिक्ख समाज पिछले लगभग साढ़े तीन सौ वर्षों से महाराष्ट्र की मिट्टी, संस्कृति और समाज के साथ पूरी तरह एकरूप हो चुका है। यह केवल धार्मिक संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्ता है।
इसीलिए आपसे मेरी हाथ जोड़कर विनम्र प्रार्थना है कि जो लोग दूसरे राज्यों से आकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए सचखंड गुरुद्वारा बोर्ड के कानून में परिवर्तन करवाना चाहते हैं, उनसे उचित दूरी बनाए रखें। इसके स्थान पर हजूर साहिब, मराठवाड़ा की जनता, यहाँ की ऐतिहासिक परंपराओं तथा आदरणीय पंज प्यारे साहिबान द्वारा जारी हुकमनामे का सम्मान करते हुए वर्तमान सचखंड गुरुद्वारा बोर्ड अधिनियम, 1956 को यथावत बनाए रखने के लिए अपना सकारात्मक योगदान दें।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप जैसे अनुभवी, धार्मिक आस्था रखने वाले एवं समाजहितैषी व्यक्ति इस विषय की गंभीरता को समझेंगे और ऐसा निर्णय लेने में सहयोग करेंगे, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ भी इस अद्वितीय विरासत को उसी स्वरूप में सुरक्षित रख सकें।
यदि मेरे शब्दों से किसी की भावनाओं को अनजाने में ठेस पहुँची हो तो मैं विनम्रतापूर्वक क्षमा प्रार्थी हूँ। मेरा उद्देश्य केवल सचखंड श्री हजूर साहिब की परंपरा, मर्यादा और ऐतिहासिक विरासत की रक्षा हेतु अपनी भावनाएँ आपके समक्ष रखना है।
भूल-चूक के लिए क्षमाप्रार्थी।

राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड
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