ममता बनर्जी का हाल देखकर अखिलेश यादव ने अपनी चुनाव रणनीती बदली 

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त्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक नई और राजनीतिक कार्य योजना तैयार की है, जो पारंपरिक ‘एजेंसी मॉडल’ से काफी अलग है। यह नया खाका न केवल उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को पेशेवर बनाने पर केंद्रित है, बल्कि इसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अनुभवों और रणनीतिक इनपुट को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

ममता बनर्जी का प्रभाव और आई-पैक (I-PAC) से दूरी

अखिलेश यादव और ममता बनर्जी के बीच संबंध हाल के समय में काफी मजबूत हुए हैं। बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद अखिलेश का कोलकाता जाकर ममता से मिलना और ममता द्वारा इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए सड़कों पर उतरने का वादा, इस गठबंधन की गहराई को दर्शाता है। हालांकि, इस रणनीतिक साझेदारी का एक बड़ा पहलू अनुभव से सीखना है। बंगाल चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार देखने वाली एजेंसी आई-पैक (I-PAC) पर आरोप लगे थे कि उसने मतदान से ठीक 10 दिन पहले अपना काम समेट लिया, जिससे टीएमसी का बूथ प्रबंधन और पूरा अभियान बिखर गया था।

इस घटनाक्रम से सबक लेते हुए अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में आई-पैक जैसी किसी बाहरी एजेंसी के बजाय एक अधिक विश्वसनीय और स्थानीय तंत्र विकसित करने का फैसला किया है। उनका मानना है कि बंगाल में जो हुआ, वह बीजेपी के दबाव में किया गया था, और वह उत्तर प्रदेश में ऐसी किसी भी चूक की गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते।

उम्मीदवार चयन का प्रोफेशनल मॉडल: आलोक रंजन और विशेषज्ञ टीम

अखिलेश यादव ने 2027 के लिए उम्मीदवारों के चयन को पूरी तरह से पेशेवर और वैज्ञानिक बनाने की तैयारी की है। इसके लिए उन्होंने पार्टी संगठन से अलग स्वतंत्र राजनीतिक बौद्धिकों और प्रेक्षकों की मदद ली है।

इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी का जिम्मा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी आलोक रंजन को सौंपा गया है। इसके लिए लखनऊ के गोमती नगर में एक विशेष कार्यालय स्थापित किया गया है। इस वार रूम में लखनऊ की एक यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर, रिसर्च स्कॉलरों और सहायक कर्मचारियों की एक बड़ी टीम काम कर रही है। यह टीम प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का गहराई से मूल्यांकन कर रही है। उम्मीदवारों को परखने के लिए कुछ कड़े मानक तय किए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • जीत की संभावना: क्या उम्मीदवार वास्तव में सीट जीतने की क्षमता रखता है?
  • स्थानीय जातीय समीकरण: क्या वह क्षेत्र के विशेष जातीय गणित में फिट बैठता है?
  • छवि और लोकप्रियता: जनता के बीच उसकी छवि कैसी है और क्या वह लोकप्रिय है?
  • अपराधिक रिकॉर्ड: उम्मीदवार के पिछले रिकॉर्ड की गहन जांच।
  • क्षेत्रीय प्रभाव: क्या उसका प्रभाव पड़ोस की विधानसभा सीटों पर भी है?

इस टीम ने एक प्रारंभिक रिपोर्ट भी तैयार कर ली है, जिसे चुनाव से पहले पुनः जांचा जाएगा और फिर पार्टी की कोर कमेटी को अंतिम निर्णय के लिए भेजा जाएगा।

संगठनात्मक अनुशासन और गुटबाजी पर लगाम

अखिलेश यादव ने पार्टी के भीतर गुटबाजी को समाप्त करने के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं। पिछले चुनावों में टिकट वितरण के बाद देखी गई भारी गुटबाजी और बार-बार टिकट बदलने की नौबत से बचने के लिए उन्होंने स्पष्ट किया है कि जो भी पदाधिकारी या जिला अध्यक्ष चुनाव लड़ना चाहता है, उसे पहले अपने पद से इस्तीफा देना होगा। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं टिकट वितरण की प्रक्रिया और संगठन के काम को प्रभावित न करें।

इसके साथ ही, टिकटों के लिए दोहरे स्तर की जांच प्रक्रिया अपनाई जा रही है:

  1. एक निजी एजेंसी के माध्यम से जमीनी सर्वे।
  2. स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं से सीधा फीडबैक।

इन दोनों के मिलान के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा, ताकि पैरवी और लॉबिंग के आधार पर टिकट पाने वालों को कड़ा संदेश दिया जा सके।

गठबंधन की राजनीति और कांग्रेस के साथ संबंध

अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों पर उम्मीदवारों की तलाश शुरू कर दी है। हालांकि, कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर अभी भी संशय बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी की सर्वे टीम ने उन 71 सीटों की पहचान की है जहां 2022 में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। सलाह दी गई है कि गठबंधन की स्थिति में सहयोगियों (जैसे कांग्रेस) को इन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कहा जाए। हालांकि, कांग्रेस 100 से अधिक सीटों के लिए दबाव बना सकती है, जिससे सीटों के बंटवारे को लेकर भविष्य में खींचतान की संभावना बनी रहेगी। चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी की भूमिका पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

चुनौतियां: बीजेपी और प्रशासनिक तंत्र

अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी और योगी आदित्यनाथ की सरकार है। अखिलेश का मानना है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं है, बल्कि सरकारी मशीनरी, चुनाव आयोग और केंद्रीय जांच एजेंसियों की संयुक्त ताकत के खिलाफ लड़ाई है। बंगाल के अनुभव का हवाला देते हुए अखिलेश ने कहा है कि वहां ममता बनर्जी हारी नहीं थीं, बल्कि उन्हें हराया गया था। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के ‘बुलडोजर’ और प्रशासनिक सख्ती के बीच एक पेशेवर और वैज्ञानिक रणनीति ही समाजवादी पार्टी को सत्ता में वापस ला सकती है।

निष्कर्ष

2027 का चुनाव अखिलेश यादव के लिए उनकी राजनीतिक परिपक्वता और रणनीतिक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। उन्होंने एजेंसी मॉडल को त्यागकर प्रशासनिक अनुभव (आलोक रंजन), शैक्षणिक विशेषज्ञता (प्रोफेसर और स्कॉलर्स) और जमीनी कार्यकर्ता फीडबैक का जो मिश्रण तैयार किया है, वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया प्रयोग है। ममता बनर्जी के अनुभवों को साथ लेकर और पार्टी के भीतर कड़े अनुशासन को लागू कर, अखिलेश एक ऐसी मशीनरी खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं जो बीजेपी के अभेद्य माने जाने वाले चुनावी तंत्र को चुनौती दे सके।



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