जब ट्रंप की हेकड़ी ने शी जिनपिंग के आगे घुटने टेक दिए – VastavNEWSLive.com
दुनिया के रंगमंच पर अक्सर ऐसे नाटक देखने को मिलते हैं जहाँ पटकथा लिखने वाला कोई और होता है और अभिनय करने वाला कोई और। लेकिन बीजिंग में जो हुआ, वह अभिनय से कहीं आगे आध्यात्मिक सरेंडर जैसा था। जिस व्यक्ति के नाम से कभी मेक्सिको की दीवारें थरथराती थीं और जो किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की पीठ ऐसे थपथपाते थे मानो वह उनका कोई पुराना चपरासी हो, वही डोनाल्ड ट्रंप आज बीजिंग की धरती पर किसी सहमे हुए स्कूली बच्चे की तरह कदम बढ़ा रहे थे।
अनुशासन का नया पाठ या भीगी बिल्ली का अवतार?
ट्रंप साहब की चाल देखिए सुस्त, खरामा-खरामा, और बेहद सलीके वाली। यह वह ट्रंप नहीं हैं जो बेअंदाजी के साथ गले मिलते थे या हाथ पकड़कर खींच लेते थे। यहाँ तो आलम यह था कि ‘डिसिप्लिन’ शब्द भी शर्मा जाए। ट्रंप साहब बहुत तमीज से शी जिनपिंग के सामने खड़े थे। शायद उन्हें पता चल गया था कि यहाँ झप्पी और पप्पी का फॉर्मूला नहीं चलेगा। जिस जिनपिंग को लोग डिक्टेटर कहते हैं, उन्होंने ट्रंप की बोलती ऐसी बंद की कि इतिहास में पहली बार अमेरिका का कोई राष्ट्रपति अपनी मजबूरी में चीन के कसीदे पढ़ता नजर आया। ट्रंप साहब ने बड़े प्यार से कहा, चाइना, यू हैव डन अ ग्रेट जॉब… यू आर अ ग्रेट लीडर,। ऐसा लग रहा था मानो ट्रंप साहब चीन के लिए पीआर (PR) एजेंसी चला रहे हों।
ताइवान: वह शब्द जो डिक्शनरी से गायब हो गया
सबसे मजेदार बात तो ताइवान के मसले पर रही। ताइवान, जो चीन और अमेरिका के बीच की सबसे बड़ी हड्डी माना जाता है, ट्रंप के भाषण से ऐसे गायब था जैसे गधे के सिर से सींग। जिस मुद्दे पर दुनिया जंग की उम्मीद लगाए बैठी थी, उस पर ट्रंप ने एक शब्द तक नहीं बोला। दूसरी तरफ, शी जिनपिंग कम बोलने की अपनी छवि तोड़कर आज कुछ ज्यादा ही बोल रहे थे। उन्होंने साफ लहजे में कह दिया कि अमेरिका का ताइवान में दखल मंजूर नहीं होगा, वरना रिश्ता खराब होगा और युद्ध जैसी स्थिति भी आ सकती है। ट्रंप साहब चुपचाप यह सब सुनते रहे, मानो वह कोई बहुत बड़ी गलती करके आए हों और अब हेडमास्टर की डांट सुन रहे हों।

हॉर्मोनस, होमूस और हथियारों का एक्सरे
चीन ने इशारों-इशारों में ट्रंप को अपनी औकात बता दी। उन्होंने कहा कि हॉर्मोनस खुलने चाहिए, जिसका सीधा मतलब था कि अमेरिका अपना नेवल ब्लॉकेड (नौसैनिक घेराबंदी) हटाए,। कम्युनिस्टों की भाषा वैसे भी घुमावदार होती है, लेकिन यहाँ संदेश साफ था अपना बोरिया-बिस्तर समेटो और निकलो। इस पूरे ड्रामे के पीछे ४० दिनों की वह जंग है, जिसने अमेरिका की सैन्य शक्ति का एक्सरे कर दिया। चीन ने ईरान में बैठकर वह सब देख लिया जो अमेरिका छुपाना चाहता था। जिस यूएसएस अब्राहम लिंकन जंगी जहाज के नाम से दुनिया कांपती थी, वह डर के मारे अरब सागर की तरफ खिसकता नजर आया। जिनपिंग ने ट्रंप को आईना दिखाते हुए शायद चुपके से कह दिया होगा देखो, तुम लड़े ही नहीं, तुम तो भाग रहे थे। इस एक खुलासे ने ट्रंप को पूरी तरह से डिमोरलाइज कर दिया।
औद्योगिक सुपरपावर और रेयर अर्थ का जादू
ट्रंप साहब अमेरिका के री-इंडस्ट्रियलाइजेशन (पुनः औद्योगिकीकरण) की बात करते हैं, जो आज के समय में किसी चुटकुले से कम नहीं लगता। हकीकत यह है कि अगले १०० सालों तक चीन ही औद्योगिक शक्ति बना रहेगा। सेमीकंडक्टर, एडवांस्ड कंप्यूटर्स, एआई और यहाँ तक कि एलन मस्क के स्पेसक्राफ्ट के लिए भी रेयर अर्थ (दुर्लभ धातु) चाहिए, जो चीन के कब्जे में है,। ट्रंप साहब के साथ १०-२० कंपनियों के बड़े-बड़े हुज़ हु (दिग्गज) बीजिंग गए थे, वे ताइवान बचाने नहीं, बल्कि डील करने गए थे। ऐसा लगता है कि वे ताइवान को चीन की झोली में डालकर अपनी कंपनियों के लिए रास्ते साफ करने गए थे।
नया ग्लोबल एक्सेस और पश्चिम का सूर्यास्त
आज की दुनिया में सत्ता का केंद्र बदल चुका है। रूस, चीन और ईरान अब एक ऐसा नया ध्रुव (Axis) बन चुके हैं, जिसके सामने अमेरिका का प्रभाव तेजी से ढलान पर है,। मिडिल ईस्ट में अमेरिका कुछ हासिल नहीं कर पाया, यूरोप में उसका झगड़ा चल रहा है और पैसिफिक में उसकी ताकत जवाब दे रही है। जिसे हम अमेरिकन लॉबी कहते थे, उसकी हेकड़ी अब निकल चुकी है। कनाडा जैसा देश पाला बदल चुका है और यूरोप भी अब दूसरी तरफ देख रहा है। यहाँ तक कि इजराइल और नेतन्याहू की हालत भी पतली है, जिसे अमेरिका के लिए एक ऐतिहासिक गलती माना जा रहा है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि अब सूरज पश्चिम से नहीं, बल्कि पूर्व से ही उदय हो रहा है।
भारत के लिए संदेश: ब्रिक्स की आखिरी बस
इस पूरी कहानी में भारत के लिए भी एक सबक है। प्रधानमंत्री मोदी के पास सितंबर में होने वाला ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन अपनी रणनीतियों को फिर से संरेखित (Realign) करने का आखिरी मौका है,। जब ट्रंप जैसा बेअंदाज आदमी भी भेड़-बकरी की तरह व्यवहार करने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि दुनिया की हवा किस तरफ बह रही है। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि वह इस अमेरिकन-इजराइल लॉबी से खुद को अलग करे और उस तरफ देखे जहाँ मैन्युफैक्चरिंग की सुप्रीमेसी है और दुनिया का सबसे बड़ा कारखाना है,।
निष्कर्ष: आईना सिर्फ ट्रंप को नहीं मिला
अंत में, शी जिनपिंग ने ट्रंप को जो आईना दिखाया है, वह दरअसल पूरी दुनिया को दिखाया गया है। ट्रंप का वह शिपिश (भेड़ जैसा) बिहेवियर और ताइवान पर उनकी रहस्यमयी चुप्पी यह बताने के लिए काफी है कि अब दुनिया की व्यवस्था बदल चुकी है। जो आदमी फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन की बीवी का मजाक उड़ाता था और किसी को भी गाली दे देता था, वह आज बीजिंग में जुबान सील करके बैठा था। तो साहब, अब सच को स्वीकार करने का समय आ गया है। जिस मुल्क के पास रेयर अर्थ है, जिसके पास एक्सपोर्ट्स की ताकत है, वही अब दुनिया का बॉस है। ट्रंप की यह यात्रा कूटनीति नहीं, बल्कि एक साम्राज्य के पतन का लाइव टेलीकास्ट थी।
