सऊदी अरब की अमरीका को चेतावनी हज यात्रा पूरी होने तक हमला ना करे
वर्तमान में मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) की स्थिति एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुँच गई है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता सैन्य तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। हालिया घटनाक्रमों ने संकेत दिए हैं कि ईरान में कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक बाजार में हलचल पैदा कर दी है। विशेष रूप से सऊदी अरब द्वारा अमेरिका को दी गई चेतावनी ने इस पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है।
ईरान का खाली आसमान: हमले का पूर्वाभास? हाल ही में फ्लाइट रडार से प्राप्त डेटा ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इस डेटा के अनुसार, ईरान का हवाई क्षेत्र (एयर स्पेस) पूरी तरह से खाली नजर आ रहा है। ईरान के आसमान में एक भी विमान या फ्लाइट उड़ती हुई नहीं दिखाई दे रही है, जबकि इसके पड़ोसी देशों का आसमान विमानों की आवाजाही से भरा हुआ है। विशेषज्ञों और सूत्रों, जैसे क्रिप्टो रोवर, का मानना है कि हवाई क्षेत्र का इस तरह से खाली होना किसी बड़े सैन्य हमले या बड़े सैन्य ऑपरेशन का संकेत हो सकता है। उल्लेखनीय है कि ऐसी ही स्थिति 28 फरवरी को भी देखी गई थी, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर सैन्य हमले किए थे। इतिहास खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है, जिससे यह आशंका प्रबल हो गई है कि अमेरिका और इजराइल ईरान के खिलाफ किसी बड़ी कार्रवाई की तैयारी में हैं।
सऊदी अरब की चेतावनी और हज का महत्व इस तनावपूर्ण माहौल के बीच सऊदी अरब ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सऊदी अरब ने डॉनल्ड ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे ईरान पर हमला न करें। सऊदी अरब ने अमेरिका से आग्रह किया है कि वह ईरान के खिलाफ किसी भी नए सैन्य अभियान को हज के पवित्र महीने के बाद तक के लिए टाल दे।

सऊदी अरब में हज का मौसम 24 मई से शुरू हो रहा है, जो महीने के अंत तक चलेगा। सऊदी अरब का तर्क है कि यदि इस समय हमला होता है, तो ईरान निश्चित रूप से जवाबी कार्रवाई (रिटालिएशन) करेगा। ऐसी स्थिति में सऊदी अरब में सुरक्षा व्यवस्था (सिक्योरिटी लैप्स) का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। यदि हवाई यात्राएं बाधित होती हैं या सुरक्षा कारणों से उड़ानें रद्द होती हैं, तो दुनिया भर से आए लाखों हज यात्रियों के लिए भारी समस्या पैदा हो जाएगी। सऊदी अरब का मानना है कि जंग शुरू होने की स्थिति में वह खुद को उतना सुरक्षित नहीं रख पाएगा जितना वह वर्तमान में है, और इसलिए उसने स्पष्ट कर दिया है कि यदि अमेरिका अभी हमला करता है, तो सऊदी अरब उसका साथ नहीं दे पाएगा।
ट्रंप की बदलती रणनीति और पेंटागन की चिंता दिलचस्प बात यह है कि सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों के दबाव के बाद डॉनल्ड ट्रंप के सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं। पहले जहाँ ट्रंप ईरान को बड़ी चोट (Big Hit) पहुँचाने की धमकियाँ दे रहे थे, वहीं अब वे कूटनीति की बात कर रहे हैं। क्लैश रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने अब ईरान के लोगों की प्रशंसा शुरू कर दी है और कहा है कि वे बहुत ही प्रतिभाशाली और समझदार लोग हैं जिनके साथ बातचीत चल रही है।
हालांकि, ट्रंप के इस रुख में बदलाव की एक बड़ी वजह पेंटागन की वह गोपनीय रिपोर्ट भी है, जिसमें ईरान की बढ़ती सैन्य ताकत के बारे में चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान का ट्रैकिंग सिस्टम और एयर डिफेंस सिस्टम पहले की तुलना में बहुत अधिक मजबूत हो गया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय को डर है कि यदि हमला होता है, तो ईरान के पास अमेरिकी विमानों को मार गिराने की क्षमता है। 40 दिनों की पिछली जंग में अमेरिका के 42 से ज्यादा एयरक्राफ्ट नष्ट हो चुके हैं, और पेंटागन को डर है कि नई जंग में अमेरिकी विमान ताश के पत्तों की तरह गिर सकते हैं।

होरमुस जलडमरूमध्य: ईरान का सबसे बड़ा हथियार इस पूरे संघर्ष का एक प्रमुख केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। ईरान भली-भांति जानता है कि यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए एक प्रमुख चोक पॉइंट है और इसके जरिए वह पूरी दुनिया पर नियंत्रण रख सकता है। ईरान ने इस क्षेत्र के लिए एक विशेष विंग पर्शियन गल्फ स्ट्रीट अथॉरिटी का गठन किया है, जो जहाजों की आवाजाही की निगरानी करता है।
ईरान की नई रणनीति के तहत, होरमुस से गुजरने वाले किसी भी कमर्शियल जहाज या तेल टैंकर को ईरान से अनुमति (कोऑर्डिनेशन) लेना अनिवार्य कर दिया गया है। हाल ही में ईरान ने अपनी इस शक्ति का प्रदर्शन करते हुए लगभग 26 जहाजों को अपने समन्वय के माध्यम से यहाँ से रवाना किया है। ईरान का यह बढ़ता वर्चस्व अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है, क्योंकि बिना ईरानी अनुमति के जहाजों का निकलना अब लगभग असंभव होता जा रहा है।
कूटनीतिक प्रयास और पाकिस्तानी मध्यस्थता युद्ध की इन आशंकाओं के बीच कूटनीतिक रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, ईरान ने हाल ही में एक 14-सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया था, जिसके जवाब में अमेरिका ने पाकिस्तान के मध्यस्थों (Pakistani Mediators) के माध्यम से तेहरान को अपना एक मसौदा (ड्राफ्ट) भेजा है। वर्तमान में पाकिस्तानी मध्यस्थ तेहरान में मौजूद हैं और दोनों देशों के बीच किसी समझौते पर पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि अभी तक किसी अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं हुई है।
ईरान की आर्थिक स्थिति और अमेरिकी प्रतिबंध अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों और ब्लॉकेड (नाकाबंदी) के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश की है, ताकि वहां भुखमरी और आर्थिक संकट पैदा हो। हालांकि, ईरान इन प्रतिबंधों को झेलने में सक्षम हो चुका है क्योंकि वह दशकों से अमेरिकी बैन का सामना कर रहा है। ईरान का दावा है कि वह अमेरिका के इस ब्लॉकेड के साथ अगले 3-4 महीनों तक आसानी से काम चला सकता है। इतना ही नहीं, ईरान अब क्यूबा जैसे अन्य देशों को भी यह सिखा रहा है कि अमेरिका के प्रतिबंधों का मुकाबला कैसे किया जाए।
निष्कर्ष ईरान और अमेरिका के बीच का यह तनाव एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ एक छोटी सी गलती एक विनाशकारी युद्ध को जन्म दे सकती है। सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश युद्ध की भयावहता को समझते हैं और अपनी सुरक्षा और धार्मिक यात्राओं की अखंडता बनाए रखने के लिए अमेरिका पर लगाम कस रहे हैं। होरमुज़ पर ईरान का नियंत्रण और उसकी मजबूत होती सैन्य क्षमता ने अमेरिका को सीधे सैन्य टकराव के बजाय कूटनीति की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। यदि जल्द ही बातचीत के जरिए कोई समाधान नहीं निकला, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और वैश्विक शांति के लिए आने वाला समय भयानक तूफान जैसा हो सकता है।
