संवैधानिक संकट और पश्चिम बंगाल में सत्ता का संघर्ष – VastavNEWSLive.com
चुनाव परिणाम और ममता बनर्जी का रुख
पश्चिम बंगाल विधानसभा की कुल 293 सीटों (एक सीट पर चुनाव दोबारा होना है) में से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 207 सीटों पर बड़ी जीत हासिल की है, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को केवल 80 सीटों से संतोष करना पड़ा है। आमतौर पर इतने स्पष्ट जनादेश के बाद मौजूदा मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप देते हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने एक अलग ही रास्ता चुना है।
नतीजों के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा, मैं इस्तीफा नहीं दूंगी।, उनका तर्क है कि वे चुनाव हारी नहीं हैं, बल्कि उनके खिलाफ एक बलपूर्वक प्रयास (forceful attempt) किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव आयोग और पूरी मशीनरी का उपयोग करके इस चुनाव को पूरी तरह से हाइजैक कर लिया है।, ममता दीदी का मानना है कि वे नैतिक रूप से यह चुनाव जीत चुकी हैं, और इसलिए इस्तीफे का प्रश्न ही नहीं उठता।
संवैधानिक प्रक्रिया और कानूनी पेच
ममता बनर्जी का इस्तीफा न देने का फैसला देश के लोकतंत्र में दुर्लभ है। पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है। संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार, चुनाव आयोग नवनिर्वाचित विधायकों की सूची राज्यपाल को भेजता है। एक बार जब यह सूची गजट में प्रकाशित हो जाती है, तो नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है। सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल सबसे बड़े दल (इस मामले में 207 सीटों वाली भाजपा) को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। भाजपा अपने विधायक दल के नेता का चुनाव करेगी, जो राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगा। कानूनी रूप से, जिस क्षण नया मुख्यमंत्री शपथ लेता है, पुराने मुख्यमंत्री का कार्यकाल और उनकी मंत्रिपरिषद स्वतः ही समाप्त हो जाती है। इसलिए, ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने से सरकार गठन की प्रक्रिया पर कोई बड़ा कानूनी प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन यह भारतीय संसदीय परंपराओं के खिलाफ एक चुनौती जरूर है।
ममता बनर्जी का विद्रोही व्यक्तित्व और इतिहास
ममता बनर्जी का यह अड़ियल या बगावती रुख उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रहा है।, उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 15 वर्ष की आयु में छात्र राजनीति से हुई थी। आपातकाल के दौरान, जब जयप्रकाश नारायण कोलकाता आए थे, तब 22 वर्षीय ममता उनके विरोध में उनकी गाड़ी के बोनेट पर चढ़ गई थीं। 90 के दशक में, जब वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में गठबंधन सहयोगी थीं, तब भी उनके और जयललिता के नखरों ने सरकार की नाक में दम कर रखा था। एक बार रेल किराया बढ़ने पर वे गुस्से में दिल्ली छोड़कर कोलकाता चली गई थीं। उस समय प्रधानमंत्री वाजपेयी को खुद उनके घर जाना पड़ा था, जहाँ उन्होंने ममता की माताजी से कहा था, आपकी बेटी बहुत शैतान है।, उनका यही विद्रोही स्वभाव आज भी उनके निर्णयों में झलकता है, जहाँ वे जनादेश के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
राष्ट्रीय राजनीति और इंडिया गठबंधन की भूमिका
71 वर्षीय ममता बनर्जी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अब दोबारा विधानसभा चुनाव लड़कर सदन में नहीं आएंगी। इसके बजाय, वे ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के साथ मिलकर केंद्र में भाजपा के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगी। उन्होंने बताया कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने उनसे फोन पर बात की है और अखिलेश यादव भी उनसे मिलने आने वाले हैं। उनका कहना है कि वे अब सड़कों पर उतरकर भाजपा का विरोध करेंगी और भाजपा को सिखाएंगी कि विरोध प्रदर्शन कैसे किया जाता है। इसी बीच, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक परिपक्व राजनीतिक रुख अपनाया है। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे तृणमूल कांग्रेस की हार पर उनका मजाक न उड़ाएं या उन पर हमला न करें। राहुल गांधी ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक पार्टी की जीत या हार की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को बचाने की है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को याद दिलाया कि राजनीति केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि देश के मूल्यों के लिए होनी चाहिए।
तमिलनाडु का परिदृश्य
पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु की राजनीति में भी हलचल तेज है। वहां अभिनेता विजय की पार्टी ने 107 सीटें जीती हैं, जबकि बहुमत के लिए 118 सीटों की आवश्यकता है।, वहां भी सरकार गठन के लिए अन्य छोटे दलों और कांग्रेस (जिसके पास 5 विधायक हैं) के समर्थन की जरूरत होगी। प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी दोनों ने विजय को उनकी सफलता पर बधाई दी है, जिससे दक्षिण की राजनीति में भी नए समीकरण बनने की संभावना है।
निष्कर्ष
ममता बनर्जी का इस्तीफा न देने का निर्णय एक अभूतपूर्व संवैधानिक स्थिति पैदा कर रहा है। जहां एक ओर वे इसे लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई बता रही हैं, वहीं आलोचक इसे संविधान का अपमान मान रहे हैं।, डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा दिए गए संविधान के अनुसार, जनादेश को स्वीकार करना लोकतंत्र की पहली शर्त है। पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या संवैधानिक संस्थाएं अपनी गरिमा बनाए रख पाती हैं या यह संघर्ष एक नए राजनीतिक संकट को जन्म देता है।
