गुरु की गद्दी कभी उम्र देखकर नहीं दी गई, बल्कि गुरु की रज़ा और योग्य पात्रता देखकर दी गई

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सिक्ख धर्म में उम्र नहीं, बल्कि योग्यता, आत्मिक ऊंचाई और गुरमत के प्रति समर्पण को महत्व दिया जाता है। इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि गुरु की गद्दी कभी उम्र देखकर नहीं दी गई, बल्कि गुरु की रज़ा और योग्य पात्रता देखकर दी गई।

इस सिद्धांत को समझाने के लिए कुछ प्रमाण

श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब जी
सिर्फ 5 वर्ष की छोटी उम्र में ही गुरु पद प्राप्त किया। इतनी कम उम्र में भी उन्होंने दिल्ली में सेवा, करुणा और रोगियों की मदद करके यह  दिखाया कि आत्मिक शक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती।

श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी
लगभग 9 वर्ष की उम्र में गुरु बने और आगे चलकर खालसा पंथ की स्थापना की। यह दर्शाता है कि साहस, नेतृत्व और धर्म रक्षा के लिए उम्र नहीं, बल्कि हौसला और विश्वास चाहिए।

श्री गुरु रामदास जी
उन्हें जीवन के परिपक्व चरण में गुरु पद मिला, जो यह सिद्ध करता है कि समय के साथ साधना और सेवा भी इंसान को योग्य बनाती है।

श्री गुरु अंगद देव जी
गुरु नानक देव जी ने अपने पुत्रों को नहीं, बल्कि भाई लेहणा जी (गुरु अंगद देव जी) को उनकी सेवा, नम्रता और पूर्ण समर्पण देखकर गुरु बनाया—यह सबसे बड़ा उदाहरण है कि वंश या उम्र नहीं, बल्कि गुण और सेवा ही असली पात्रता है।

सिक्खी का मूल सिद्धांत:

“सेवा, सिमरन और समर्पण से ही ऊंचाई मिलती है”
“उम्र नहीं, कर्म और नीयत ही इंसान को महान बनाते हैं”

सिक्ख धर्म हमें यह सिखाता है कि छोटा हो या बड़ा, हर व्यक्ति में महान बनने की क्षमता होती है, बस जरूरत है सही मार्ग, सच्चे कर्म और गुरु की कृपा की।

राजेंद्र सिंघ नौनिहाल सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर अबचलनगर नांदेड 7700063999



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