चने को बादाम कहना
प्याज़ को सफेद सेब कहना
लहसुन को सफेद इलायची कहना
पानी को अमृत कहना
रोटी को प्रसादा कहना
इन शब्दों के पीछे संदेश यह है कि जीवन में जो भी परमात्मा की बख्शिश के रूप में प्राप्त हो, उसे सम्मान, संतोष और खुशी के साथ स्वीकार किया जाए।
निहंग सिंघों की यह सोच हमें सिखाती है कि ..
परिस्थितियाँ नहीं, दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है।
अभाव में भी प्रसन्न रहना ही चढ़दी कला है।
साधारण वस्तु का भी सम्मान करना चाहिए।
शिकायत करने से नहीं, शुक्राना करने से मन मजबूत होता है।
सकारात्मक सोच साधारण चीज़ों को भी अनमोल बना देती है।
आज के समय में जब लोग छोटी-छोटी बातों से निराश हो जाते हैं, तब निहंग सिंघों की यह प्रेरणादायी परंपरा हमें याद दिलाती है कि खुश रहने के लिए धन-दौलत से अधिक आवश्यक एक अच्छा और संतुष्ट मन है।
जिसे दुनिया चना समझती है, चढ़दी कला वाला उसे बादाम समझकर खाता है। क्योंकि ताकत वस्तु में नहीं, सोच में होती है।
वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।
– राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड
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