मोहनलाल बोचीवाल साहब सम्मान जबरदस्ती नहीं लिया जा सकता 

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पुरानी कहावत है राजा वही अच्छा, जिसे प्रजा चाहे। जब किसी संगठन का नेतृत्व समाज के विश्वास से दूर हो जाए, तब उस पद की गरिमा स्वतः कम होने लगती है। समाज किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि सामूहिक विचारों और परंपराओं का दर्पण होता है। यदि समाज की आवाज़ को अनसुना किया जाए, तो संगठन की जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं।

हमारे बुजुर्ग कहा करते थे एक लकड़ी टूट जाती है, पर बंधा हुआ गट्ठर नहीं टूटता।अर्थात संगठन की शक्ति उसकी एकता में होती है। यदि समाज के भीतर मतभेद बढ़ते जाएँ और नेतृत्व समाज की भावनाओं को समझने में असफल रहे, तो धीरे-धीरे संगठन बिखरने लगता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज और नेतृत्व दोनों धैर्य और समझदारी से काम लें।

एक और पुरानी उक्ति है समय बड़ा बलवान होता है। समय के अनुसार परिवर्तन स्वीकार करना ही बुद्धिमानी कहलाती है। यदि समाज परिवर्तन चाहता है, तो उस भावना का सम्मान होना चाहिए। पद किसी की जागीर नहीं होता। हमारे संतों और विद्वानों ने भी कहा है पद सेवा का माध्यम है, अधिकार का सिंहासन नहीं। अध्यक्ष का दायित्व समाज को साथ लेकर चलना होता है, न कि समाज को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ना।

आज यदि समाज का बहुमत परिवर्तन चाहता है, तो उसका समाधान लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से निकालना चाहिए। समाज को भावनाओं में बहकर कटुता नहीं फैलानी चाहिए। क्योंकि जहाँ कटु वचन होते हैं, वहाँ रिश्तों में दरार पड़ती है  पर समाज के कुछ ठेकेदार जो ऐसा समझते है की समाज हमरी वजह से है वह दरारे विरोध होना स्वाभाविक है, परंतु विरोध की भाषा मर्यादित और संस्कारयुक्त होनी बढ़ाने का प्रयास करते रहते है। यही खांडल विप्र समाज की पहचान बन रही है।

समाज को चाहिए कि वह महासभा के नियमों और संविधान के अनुसार सामूहिक बैठक आयोजित करे, वरिष्ठजनों की राय ले तथा पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए। यदि आवश्यक हो तो सर्वसम्मति अथवा मतदान के माध्यम से नया नेतृत्व चुना जाए। क्योंकि दूध का दूध और पानी का पानी करने का यही उचित मार्ग है। समाज की शक्ति उसकी व्यवस्था और अनुशासन में निहित होती है।

मोहनलाल बोचीवाल जी को भी यह समझना चाहिए कि सम्मान जबरदस्ती नहीं लिया जाता, वह समाज की स्वीकृति से प्राप्त होता है। पुरानी कहावत है मान वही टिकता है, जो त्याग से मिलता है। यदि वे स्वयं समाज की भावना को समझकर पद त्याग करते हैं, तो उनका सम्मान और अधिक बढ़ेगा। इतिहास उन्हीं लोगों को याद रखता है जिन्होंने समाज को जोड़ने का कार्य किया हो, न कि समाज को विभाजित करने का।

खांडल विप्र समाज सदैव ज्ञान, संस्कार और एकता का प्रतीक रहा है। आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध की नहीं, बल्कि समाज की प्रतिष्ठा बचाने की है। क्योंकि घर का झगड़ा चौपाल तक पहुँच जाए, तो सम्मान घटता है। कुछ लोग चौपाल पर ही बखेड़ा लेन के माहिर है ।  इसलिए सभी पक्षों को संयम और बुद्धिमत्ता से निर्णय लेना चाहिए।

अंत में यही कहना उचित होगा कि समाज किसी एक व्यक्ति से बड़ा होता है। पद आते-जाते रहते हैं, पर समाज की एकता और सम्मान हमेशा सर्वोपरि रहते हैं। यदि समाज एकजुट होकर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ेगा, तो निश्चित रूप से समाधान निकलेगा और संगठन पुनः मजबूती के साथ कार्य करेगा। जहाँ चाह, वहाँ राह  यही हमारे पूर्वजों की सीख रही है, और यही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।

– रामप्रसाद चोटीया 



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