सत्ता से सवाल पूछना ही सच्ची पत्रकारिता है – नार्वे की पत्रकार हेली
उम्र से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आप सत्ता से सही सवाल पूछने का साहस रखते हैं या नहीं;एक सवाल जो चर्चा का विषय बन गया
नार्वे की पत्रकार हेली और भारतीय प्रेस स्वतंत्रता: एक विस्तृत विश्लेषण
नार्वे की एक 28 वर्षीय पत्रकार, हेली, हाल ही में तब चर्चा में आईं जब उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नार्वे यात्रा के दौरान उनसे प्रेस स्वतंत्रता को लेकर तीखे सवाल पूछे। उनके एक साधारण से सवाल आप दुनिया के सबसे स्वतंत्र देश (नार्वे) के पत्रकारों के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते? ने भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छेड़ दी। हेली का उद्देश्य केवल अपना काम करना और सत्ता से सवाल पूछना था, लेकिन इसके बाद उन्हें भारतीय टीवी मीडिया पर ट्रोलिंग और आलोचना का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, एक पत्रकार को कभी खुद खबर नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसे उन लोगों की आवाज बनना चाहिए जिन्हें सिस्टम और मुख्यधारा का मीडिया नजरअंदाज कर देता है।
प्रेस स्वतंत्रता और भारत की छवि: हेली के सवाल का आधार
हेली ने बताया कि उनके मन में भारत पर भरोसे को लेकर सवाल इसलिए उठा क्योंकि एक तरफ तो नार्वे और भारत अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत कर रहे हैं और जलवायु संकट जैसे मुद्दों पर मिलकर काम कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी की अंतरराष्ट्रीय संगठनों और व्यक्तिगत पत्रकारों द्वारा आलोचना की जा रही है। उन्होंने भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन और प्रेस स्वतंत्रता के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त की। हेली का मानना है कि जब नार्वे जैसा छोटा देश भारत को एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने में मदद कर रहा है, तो यह पूछना जरूरी हो जाता है कि क्या भारत अपनी इस शक्ति का उपयोग उन समस्याओं को सुलझाने में करेगा जो पिछले 12 वर्षों में उत्पन्न हुई हैं।
उन्होंने रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत में पत्रकारों की स्थिति चिंताजनक है। जब उन्होंने इस रिपोर्ट को पढ़ा और देखा कि भारत में पत्रकारों के साथ क्या हो रहा है और कितने पत्रकारों की जान गई है, तो वह स्तब्ध रह गईं। यही कारण था कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को प्रेस स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के मुद्दे पर चुनौती देने का फैसला किया, जबकि प्रधानमंत्री वहां नवीकरणीय ऊर्जा और सुरक्षा जैसे विषयों पर बात करने आए थे।
भारतीय मीडिया का पलटवार: व्यक्तिगत हमले और कुप्रचार
हेली के सवालों के बाद भारतीय मीडिया के एक वर्ग, जिसे अक्सर गोदी मीडिया कहा जाता है, ने उन पर व्यक्तिगत हमले शुरू कर दिए। अंजना ओम कश्यप (आजतक) ने उन पर आरोप लगाया कि उनके संगठन को जॉर्ज सोरोस द्वारा फंड दिया जाता है। हेली ने इन आरोपों को पूरी तरह से गलत और मिसइन्फॉर्मेशन (भ्रामक जानकारी) करार दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग झूठ फैलाना चाहते हैं, वे हमेशा ऐसा करेंगे, और यह देखना दुखद है कि उनके ठोस सवालों का जवाब देने के बजाय उन पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं。
इसी तरह, सुधीर चौधरी (ज़ी न्यूज़) ने उनकी पत्रकारिता की क्षमता पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने तर्क दिया कि हेली केवल 28 वर्ष की हैं और उनका करियर मात्र 5-6 साल का है, इसलिए उनमें प्रधानमंत्री जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल पूछने की समझ नहीं है। हेली ने इसके जवाब में कहा कि उनकी उम्र, लुक्स या अनुभव के आधार पर उनके सवालों को कमतर आंकना गलत है।
हेली का करियर और पत्रकारिता का अनुभव
अपनी योग्यता पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए हेली ने बताया कि 28 साल की उम्र में भी उन्होंने काफी अनुभव हासिल किया है। वह संयुक्त राज्य अमेरिका में एक विदेशी संवाददाता के रूप में काम कर चुकी हैं, जहां उन्होंने अकेले ग्राउंड पर रहकर मागा (MAGA) समर्थकों, गर्भपात (abortion) और आव्रजन (immigration) जैसे गंभीर मुद्दों को कवर किया था। इसके अलावा, उन्होंने अपने पुराने मीडिया संस्थान के साथ मिलकर एक स्थानीय समाचार पत्र शुरू करने में भी मदद की थी और वर्तमान में वह नार्वे में एक कमेंटेटर (टीकाकार) के रूप में कार्यरत हैं। उनका मानना है कि उम्र से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आप सत्ता से सही सवाल पूछने का साहस रखते हैं या नहीं।
नार्वे और भारत: सत्ता और लोकतंत्र की अलग-अलग तस्वीरें
हेली ने नार्वे और भारत के बीच राजनीतिक संस्कृति के अंतर को बहुत ही दिलचस्प तरीके से समझाया। भारत में प्रधानमंत्री को एक ‘मसीहा’ या ‘हीरो’ का दर्जा दिया जाता है, लेकिन नार्वे में ऐसा नहीं है। उन्होंने एक घटना साझा की जहां उनके दोस्त ने बताया कि नार्वे के प्रधानमंत्री एक बार में बगल वाली टेबल पर बैठे थे。 नार्वे में यह एक सामान्य बात है; वहां के प्रधानमंत्री और अन्य नेता समाज के बीच खुलेआम घूमते हैं और लोगों के साथ कैफे या बार में बैठते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि नार्वे में राजा होने के बावजूद, प्रधानमंत्री को कोई किंग (राजा) नहीं माना जाता। वहां नेता जनता से अलग-थलग नहीं रहते। हेली का मानना है कि राजनेताओं का समाज के बीच होना महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, भारत में यदि कोई छोटा नेता भी किसी बार में चला जाए, तो मीडिया में हंगामा मच जाता है। यह दर्शाता है कि दोनों देशों में लोकतंत्र और सत्ता को देखने का नजरिया कितना अलग है।
अडाणी समूह पर नार्वे का रुख और आर्थिक नैतिकता
बातचीत के दौरान हेली ने भारत के प्रमुख व्यापारिक समूह अडाणी का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि नार्वे के ट्रेजरी फंड (पेंशन फंड) ने अडाणी पोर्ट्स और अडाणी ग्रीन एनर्जी जैसी कंपनियों को प्रतिबंधित कर दिया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह उन विशिष्ट मामलों की गहराई से जांच नहीं कर पाई हैं, लेकिन नार्वे में निवेश के लिए बहुत सख्त मानदंड और उच्च मानक हैं।
नार्वे का तेल कोष (Oil Fund) दुनिया के सबसे बड़े और धनी फंडों में से एक है, और इसकी अपनी एक मार्केट पावर है। हेली के अनुसार, नार्वे का उद्देश्य केवल पैसा कमाना या अमीर बनना नहीं है, बल्कि वे उन कंपनियों में निवेश नहीं करना चाहते जो उनके नैतिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरतीं। यह प्रतिबंध इसी आर्थिक नैतिकता का हिस्सा है, जिस पर नार्वे में काफी चर्चा होती है。
महिला पत्रकारों को निशाना बनाना: एक प्रभावी हथियार
हेली ने इस बात पर भी दुख व्यक्त किया कि जब कोई महिला पत्रकार मुखर होकर सवाल पूछती है, तो उसे दबाने के लिए उसके चरित्र और शालीनता (modesty) पर हमले किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी कुछ ऐसी तस्वीरें साझा की गईं जिन्हें अशालीन बताया गया, और यहां तक कि उनके डीपफेक वीडियो (बिकनी में) भी बनाए गए।
हेली ने कहा कि एक युवा महिला हमेशा सॉफ्ट टारगेट होती है और उस पर हमला करना आसान होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इन चीजों की परवाह नहीं करतीं क्योंकि वह खुद को अच्छी तरह जानती हैं। उनका मानना है कि यह सब उनके मूल मुद्दे प्रेस स्वतंत्रता से ध्यान भटकाने की एक कोशिश है। वह चाहती हैं कि चर्चा उनके कपड़ों या उम्र पर नहीं, बल्कि भारत में प्रेस की स्थिति और मानवाधिकारों पर होनी चाहिए।
निष्कर्ष: सत्ता से सवाल पूछना ही सच्ची पत्रकारिता है
अंत में, हेली की कहानी यह दर्शाती है कि कैसे एक पत्रकार का सत्ता से पूछा गया मात्र एक सवाल पूरे सिस्टम को हिला सकता है। भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से ने उनके सवालों का जवाब ढूंढने के बजाय उन पर ही हमला करना शुरू कर दिया, जो खुद उनकी पत्रकारिता पर सवाल खड़े करता है। हेली का संदेश स्पष्ट है: पत्रकारिता का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि कठिन सवाल पूछना और उन लोगों के लिए बोलना है जिनकी आवाज दबा दी गई है। उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारों की सराहना की जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना काम कर रहे हैं। हेली का यह अनुभव न केवल भारत में प्रेस की गिरती स्थिति को उजागर करता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने की आजादी कितनी महत्वपूर्ण है, चाहे वह सवाल देश के भीतर से उठे या सात समंदर पार किसी दूसरे देश से।
