जब रक्षक ही भक्षक की भाषा बोलने लगे – VastavNEWSLive.com

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लोकतंत्र के सबसे ऊँचे मंदिर की ऊँची मीनारों से जब न्याय के देवता अपना मुँह खोलते हैं, तो अपेक्षा यह होती है कि वहाँ से संविधान की अमृतवाणी झरेगी। पर अफसोस! आज उन मीनारों से आम नागरिकों, बेरोजगार युवाओं और अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्टों के लिए जो शब्द निकल रहे हैं, वे अमृत नहीं, बल्कि सत्ता की हनक में डूबा हुआ जहर हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत का हालिया बयान कि देश के बेरोजगार युवा जो किसी पेशे में जगह नहीं बना पाते, वे कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं और सिस्टम पर हमला करते हैं, केवल एक मौखिक टिप्पणी नहीं है; यह उस सामंती मानसिकता का नग्न प्रदर्शन है जो आज न्यायपालिका के गलियारों में सड़न पैदा कर रही है।,

कितनी अजीब विडंबना है! जिस देश की 65 प्रतिशत आबादी युवा है, जहाँ नीट (NEET) जैसे पेपर लीक हो रहे हैं, जहाँ अग्निवीर जैसी योजनाओं से युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, वहाँ न्याय की आखिरी उम्मीद माने जाने वाले जज साहब को ये पीड़ित युवा कॉकरोच नजर आते हैं।, सौरभ दास जैसे खोजी पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट, जिन्होंने न्यायपालिका के भीतर की गंद को उजागर किया, वे जस्टिस सूर्यकांत की नजर में परजीवी (Parasite) और ‘कॉकरोच’ हैं क्योंकि वे सवाल पूछने की जुर्रत करते हैं।, शायद माननीय को यह नहीं पता कि जिस कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल उन्होंने हिकारत के लिए किया, वह जीव परमाणु हमले में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। भारत का युवा भी आज उसी रेजिलिएंस (Resilience) का परिचय दे रहा है सिस्टम के बार-बार फेल होने के बावजूद वह उम्मीद की किरण थामे खड़ा है।,

जस्टिस सूर्यकांत का यह बयान कोई आकस्मिक भूल नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक ‘पैटर्न’ का हिस्सा है। अगर उनके पिछले कुछ सालों के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके मन में आम जनता और संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ने वालों के प्रति कितनी नफरत भरी है। 11 मई को उन्होंने पर्यावरणविदों (Environmentalists) को आड़े हाथों लिया, 29 जनवरी को ट्रेड यूनियनों को देश की तरक्की में बाधा बताया, और मार्च 2025 में तो उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर लिखने वालों को ब्रेनलेस (दिमाग विहीन) तक कह दिया। यह गॉड सिंड्रोम (God Syndrome) नहीं तो और क्या है? क्या सुप्रीम कोर्ट की कुर्सी पर बैठते ही कोई इंसान इतना ऊपर हो जाता है कि वह अपनी ही जनता को कीड़े-मकोड़े समझने लगे?

उपरोध देखिए! माननीय कहते हैं कि ये कॉकरोच सिस्टम पर हमला करते हैं। कौन सा सिस्टम? वह सिस्टम जहाँ सौ से ज्यादा पत्रकार मार दिए जाते हैं और एक का भी कन्विक्शन नहीं होता? वह सिस्टम जहाँ आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी जाती है क्योंकि वे राशन घोटाला, मनरेगा फर्जीवाड़ा और खनन माफियाओं का पर्दाफाश करते हैं?, जिस आरटीआई और पीआईएल (PIL) ने हुसैनआरा खातून जैसे केसों में हजारों बेगुनाहों को जेल से निकाला, विशाखा गाइडलाइंस दी और पर्यावरण की रक्षा की, आज उसी हथियार को उठाने वालों को दीमक और कॉकरोच कहा जा रहा है। दरअसल, दर्द सिस्टम पर हमले का नहीं है, दर्द उस पारदर्शी व्यवस्था से है जो इन जजों के विशेषाधिकारों और उनके भीतर छिपे कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट (स्वार्थों के टकराव) को उजागर कर देती है।

जस्टिस सूर्यकांत की यह भाषा और प्रधानमंत्री का आंदोलन जीवी वाला तंज, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सत्ता चाहती है कि जनता गूंगी बनी रहे, और अब न्यायपालिका भी उसी सुर में सुर मिला रही है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग परजीवी कहते हैं, तो जज साहब भी पैरासाइट चिल्लाने लगते हैं। क्या यह डॉग विसलिंग (Dog Whistling) नहीं है? नाजी जर्मनी में भी यहूदियों को इसी तरह ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहा जाता था ताकि उनके खिलाफ नफरत को जायज ठहराया जा सके। जब देश का मुख्य न्यायाधीश ऐसी भाषा का उपयोग करता है, तो निचली अदालतों को क्या संदेश जाता है? क्या वे उन युवाओं और एक्टिविस्टों के साथ न्याय करेंगे जिन्हें उनका आका पहले ही कॉकरोच घोषित कर चुका है?,

बाद में दी गई यह सफाई कि उन्हें गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया और वे केवल फर्जी डिग्री वालों की बात कर रहे थे, एक कमजोर और हास्यास्पद पीछे हटने की कोशिश है। उनके मूल बयान में कहीं भी ‘डिग्री’ का जिक्र नहीं था; वहां सीधे तौर पर आरटीआई कार्यकर्ताओं, सोशल मीडिया यूजर्स और मीडिया पर निशाना साधा गया था। यह एक स्थापित मानसिकता है जिसे अब छिपाया नहीं जा सकता। जैसा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव बनर्जी ने कहा है, आज न्यायपालिका के नियुक्ति तंत्र (Colligeum) की धुलाई की जरूरत है क्योंकि वहां वैचारिक रूप से झुके हुए और अयोग्य लोगों की भर्ती हो रही है।

अगर न्यायपालिका ही अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध के अधिकार को कॉकरोच की हरकत मानने लगेगी, तो इस लोकतंत्र का अंत निश्चित है। एक जज से यह उम्मीद की जाती है कि वह संविधान का कस्टोडियन होगा, न कि सत्ता का भोंपू। जस्टिस सूर्यकांत को शायद यह याद दिलाने की जरूरत है कि वे जनता के सेवक हैं, स्वामी नहीं। उनके सामने आने वाला हर पीड़ित, चाहे वह एक्टिविस्ट हो या बेरोजगार युवा, वह सम्मान का हकदार है, किसी हिकारत भरी टिप्पणी का नहीं।

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि आज सिस्टम को खतरा उन कॉकरोचों से नहीं है जो सवाल पूछते हैं, बल्कि उन कुर्सियों पर बैठे लोगों से है जो सवालों को कुचलना अपना धर्म समझ बैठे हैं। अगर न्याय के मंदिर में आम आदमी के लिए सम्मान नहीं बचा, तो फिर उन भव्य इमारतों का क्या फायदा? जैसा कि मनोज झा ने अपनी चिट्ठी में लिखा, यह केवल शब्दों का चयन नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण की झलक है जो लोकतंत्र की मूल आत्मा को आहत कर रहा है। माननीय जस्टिस को चाहिए कि वे अपने इस सामंती व्यवहार के लिए बिना शर्त माफी मांगें, वरना इतिहास उन्हें एक न्यायविद् के रूप में नहीं, बल्कि उस जज के रूप में याद रखेगा जिसने न्याय के तराजू को सत्ता के अहंकार से तौल दिया था।,



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