भारत के मुख्य न्यायमूर्ती का भारतीय युवकों को कॉकरोच कहना कितना सही 

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अहंकार की रिले रेस और न्याय के कॉकरोच : एक आधुनिक प्रहसन

भारत के लोकतंत्र में इन दिनों एक बेहद रोमांचक और ‘प्रेरणादायक’ खेल चल रहा है अहंकार की रिले रेस। यह कोई सामान्य दौड़ नहीं है, इसमें बैटन (डंडा) एक अहंकारी दूसरे अहंकारी को पकड़ाता है और फिर वह नई ऊर्जा के साथ दौड़ने लगता है। राजनीति और सामंतवाद में तो यह गुण जन्मसिद्ध अधिकार माना ही जाता रहा है, लेकिन हाल ही में इस रेस में एक नया और पवित्र खिलाड़ी शामिल हुआ है भारत की न्यायपालिका। जब रक्षक ही भक्षक की भाषा बोलने लगे और संविधान के कस्टोडियन खुद को भगवान समझने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के मंदिर में ‘प्रसाद’ के रूप में अब केवल अपमान ही मिलेगा।

न्याय की कीट विज्ञान प्रयोगशाला

सुप्रीम कोर्ट के गलियारों से हाल ही में एक ऐसी टिप्पणी निकली है जिसने जीव विज्ञान की परिभाषाएं ही बदल दी हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने देश के युवाओं, वकीलों और आरटीआई कार्यकर्ताओं को कॉकरोच (तिलचट्टा) और परजीवी (पैरासाइट) की उपाधि से नवाजा है। उनके अनुसार, ये वे युवा हैं जिन्हें कहीं रोजगार नहीं मिला, इसलिए वे मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई कार्यकर्ता बनकर सिस्टम पर हमला करने लगते हैं। वाह! क्या विडंबना है। जिस देश में रोजगार पैदा करना सरकार की जिम्मेदारी थी, वहां रोजगार न मिलने पर युवा कॉकरोच घोषित कर दिए गए। शायद माय लॉर्ड यह भूल गए कि इन कॉकरोचों को पैदा करने वाला आका कौन है जो इस देश का रोजगार डकार गया है। इस न्यायिक कटाक्ष की गहराई को समझिए। यदि आप सवाल पूछते हैं, तो आप कॉकरोच हैं। यदि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ आरटीआई लगाते हैं, तो आप परजीवी हैं। इस तर्क से तो इतिहास के सबसे बड़े कॉकरोच महात्मा गांधी थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत से सवाल पूछे थे।  डॉ. बाबा साहब अंबेडकर भी शायद कॉकरोच की श्रेणी में आते, क्योंकि उन्होंने समाज की विसंगतियों पर सवाल उठाए और संविधान जैसा खतरनाक’दस्तावेज तैयार किया। आज अगर ये महापुरुष जीवित होते, तो शायद भगवान रूपी न्यायाधीश उन्हें भी अदालत की अवमानना में जेल भेज देते।

डिग्री का सर्कस और सीबीआई का हंटर

न्यायपालिका के इस नए मिजाज में चेक एंड बैलेंस  का मतलब अब केवल वकीलों की डिग्रियां चेक करना रह गया है। चीफ जस्टिस साहब को अचानक हजारों फ्रॉड वकील दिखने लगे हैं और उन्हें लगता है कि इनकी डिग्रियों की जांच सीबीआई से होनी चाहिए। कितनी अद्भुत प्राथमिकता है! वकीलों की डिग्री के लिए सीबीआई तैयार है, लेकिन जब देश के प्रधान की डिग्री पर सवाल उठता है, तो पूरी न्यायपालिका उस पर कागज की चादर ढंक कर सो जाती है। वकील फ्रॉड हो सकते हैं, लेकिन एंटायर पॉलिटिकल साइंस की डिग्री तो साक्षात ईश्वरीय सत्य है। यह वही न्यायपालिका है जहां ‘मसीह’ जैसे लोग कैमरे पर धांधली करते पकड़े जाते हैं और महीनों तक मौज मारते हैं, जबकि विपक्ष के नेता साल-भर जेल में सड़ते रहते हैं। जब सामान्य आदमी इन फैसलों पर संदेह जताता है, तो न्यायाधीशों के ‘कलेजे’ में चोट लगती है। उन्हें हुकुम के गुलाम पसंद हैं, आईना दिखाने वाले नहीं। क्योंकि आईने में जब अपनी असली शक्ल दिखती है, तो वे आईना दिखाने वाले की शक्ल बिगाड़ने पर उतारू हो जाते हैं।

तानाशाही का ‘त्रिमूर्ति’ संगम

आज देश की हालत यह है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों स्तंभ बेलगाम और तानाशाह हो चुके हैं। इन्हें लगता है कि जनता इनके पैरों की धूल है जिसे जब चाहे रौंदा जा सकता है। हिटलर ने भी तो यही किया था सवाल पूछने वालों को कीड़े-मकोड़े (कॉकरोच) कहकर मार डाला था। जब एक न्यायाधीश सार्वजनिक मंच से युवाओं को गाली देता है, तो वह सत्ता को पेस्ट कंट्रोल करने का कानूनी लाइसेंस दे देता है। यह न्याय का कैसा अहम ब्रह्मास्मि भाव है, जहां न्यायाधीश खुद को ही ब्रह्म मान बैठे हैं और बाकी संसार को कीड़ा-मकोड़ा। इनके बच्चे सरकारी वकील बनते हैं, ये राजनीतिज्ञों के साथ गलबहियां करते हैं, और रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा या अन्य बेनिफिट्स के लिए सरकार के पक्ष में फैसले सुनाते हैं। क्या इन जुडिशियल कॉकरोचों पर भी कोई सीबीआई जांच होगी जिनके घरों से नोटों की गड्डियां निकलती हैं? शायद नहीं, क्योंकि भगवान कभी फ्रॉड नहीं होते।

संविधान के दीमक बनाम जनता के कॉकरोच

जस्टिस सूर्यकांत को शायद लगता है कि माफी मांगने से उनका कद छोटा हो जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि पद की गरिमा शब्दों के चयन से होती है, न कि ऊंची कुर्सी पर बैठने से। यदि बेरोजगार युवा कॉकरोच है, तो उन 27 लाख मतदाताओं का क्या, जिनका वोट देने का अधिकार छीन लिया गया? क्या वे भी कीड़े हैं? एक तरफ वे कॉकरोच हैं जो संविधान को बचाने के लिए लड़ रहे हैं, और दूसरी तरफ वे दीमक हैं जो भीतर ही भीतर लोकतंत्र की नींव को चाट रहे हैं। दीमक बहुत घातक होते हैं, वे एक बुलंद इमारत को कब ढहा दें, पता भी नहीं चलता। आज संविधान को इन्हीं दीमकों से खतरा है जो इसे बहुसंख्यकवाद के रंग में रंगना चाहते हैं।

निष्कर्ष: एक अप्रिय सत्य

अंत में, यदि संविधान के अधिकारों के लिए लड़ना, सवाल पूछना और बेरोजगारी पर आवाज उठाना कॉकरोच बनना है, तो इस देश के हर स्वाभिमानी युवा को कॉकरोच होने पर गर्व होना चाहिए। हम गांधी, अंबेडकर और अर्जुन की उस कतार में बैठने को तैयार हैं जिन्हें व्यवस्था ने हमेशा परेशानी समझा है। माय लॉर्ड, आप जेल भेज सकते हैं, फांसी पर लटका सकते हैं, या जीवन बर्बाद कर सकते हैं, लेकिन आप उस आत्मा को नहीं मार सकते जो सवाल पूछना जानती है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े तानाशाह आए और चले गए, लेकिन कॉकरोच (जनता) हमेशा जीवित रहती है। बेहतर होगा कि आप अपनी भगवान वाली कुर्सी से नीचे झांकें और उस बेरोजगार युवा से माफी मांगें जिसका आपने अपमान किया है। वरना याद रखिये, जब इमारत गिरती है, तो सबसे पहले वही दीमक मलबे में दबते हैं जो खुद को अमर समझ रहे थे।



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