बस भी करो… तोड़ना और बनाना! अब सुरू करो जोडना,उंचा ऊठाना

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*एक घटना आज फिर सोचने पर मजबूर करती है…*

*संत बाबा शीशा सिंघ जी ने सचखंड गुरुद्वारे की चूने की दीवारों पर चारों तरफ संगमरमर लगवाया था। उस समय एक साइड के काम पर लगभग 12 लाख रुपये खर्च होने की बात याद आती है।*
*उस समय के 12 लाख रुपये आज कितने होते, यह अलग आर्थिक गणना का विषय है। लेकिन यदि बाद में वह काम निकालकर फिर नया काम किया गया हो, तो स्वाभाविक रूप से मन में एक सवाल उठता है—*
*क्या हम भविष्य में ऐसे कामों की पहले से इतनी दूर तक योजना बना सकते हैं कि संगत के पैसे और मेहनत की बचत हो सके?*
*यह सवाल किसी को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को बेहतर बनाने के लिए है।*

*आज का युग पढ़ने और हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का है*

*हजूर साहिब के जत्थेदार सिंघ साहिब संत बाबा कुलवंत सिंघ जी ने हैद्राबाद में गुरुद्वारा गौलीगुड़ा साहीब के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संगत से शिक्षा और हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की अपील की।*

*यह संदेश हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है।*

*आज हमारे बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, शिक्षक, प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी, उद्यमी, तकनीकी विशेषज्ञ, कलाकार, खिलाड़ी, उद्योजक , व्यापारी,अच्छे कारीगर और कुशल धर्म प्रचारक बनने के अवसर चाहिए।*

*गुरुघर की इमारतें अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन गुरुघर की सबसे बड़ी ताकत उसकी जागरूक, शिक्षित, संस्कारी और सक्षम संगत है।*

*जरा कल्पना कीजिए*

*अगर निर्माण और पुनर्निर्माण पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा भी योजनाबद्ध तरीके से*

*धर्म प्रचार, उच्च शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण, तकनीकी शिक्षा, हुनर विकास, अच्छे कारागीर तैयार करने, धर्म प्रचारक बनाने और सिक्ख इतिहास को पुस्तक, फिल्म तथा आधुनिक मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया तक पहुँचाने में लगाया जाए…*

*तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितने नए रास्ते खुल सकते हैं!*

*अब भी वक्त है… दिशा बदलने का नहीं, सोच को विस्तार देने का,सुखी संपन्न समाज के निर्माण करने का*

*हमें इमारतें बनाना बंद नहीं करना है।*

*हमें बस यह सोचना है कि*

*जहाँ मजबूत इमारत बच सकती है, वहाँ उसे बचाया जाए।*
*जहाँ मरम्मत से काम चल सकता है, वहाँ मरम्मत की जाए।*
*जहाँ ऐतिहासिक वास्तु है, वहाँ उसकी पहचान सुरक्षित रखी जाए।*
*और जहाँ नया निर्माण वास्तव में आवश्यक हो, वहाँ उसे दूरगामी योजना के साथ बनाया जाए। यात्री ओं और श्रध्दालूओं को हर प्रकार की अच्छी सेवा उपलब्ध कराने की भले अकेले ही या जो आर्थिक दृष्टी से कमजोर श्रध्दालु है उन्हे मोफत रहने का प्रबंध करने की, बेसहारा अकेले लोगो को रात में विश्राम करने की जगह उपलब्ध कराने की*

*साथ-साथ समाज के लिए शिक्षा, धर्म प्रचार और आर्थिक विकास की मजबूत इमारत भी खड़ी की जाए।*

*क्योंकि*

*ईंट-पत्थर की इमारतें कुछ वर्षों में पुरानी हो सकती हैं,*

*लेकिन शिक्षित और संस्कारी पीढ़ी सदियों तक समाज को मजबूत करती है।*

*संगत का दसवंध—भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी*

*इसके लिए केवल संत-महापुरुषों, नेताओं या गुरुद्वारा प्रबंधन को ही आगे आने की जरूरत नहीं है।*

*हम सबको आगे आना होगा।*

*जिस तरह संगत गुरुघर के निर्माण में अपना दसवंध देती है, उसी तरह यदि हम अपने बच्चों की शिक्षा, धर्म प्रचार, इतिहास संरक्षण और हुनर विकास के लिए भी अपना दसवंध समर्पित करें, तो एक नई दिशा पैदा हो सकती है।*

*आज आवश्यकता है*

*गुरुघर भी मजबूत हों,*
*इतिहास भी सुरक्षित रहे,*
*धर्म प्रचार भी बढ़े,*
*बच्चे भी उच्च शिक्षित हों,*
*हर क्षेत्र में सिक्ख आगे बढ़ें,* *समाज में चल रही गलत बातों को रोकने की*
*दीखावे और शान शौक पर हो रहे खर्च पर अंकुश लगाने की* *और संगत का पैसा समाज की स्थायी ताकत बने।*

*साध-संगत जी, यह किसी के विरुद्ध आवाज नहीं है।*

*यह अपनी ही संगत से एक विनम्र सवाल है*
*हमने बहुत कुछ बनाया और बहुत कुछ बदला;*
*अब क्या हम मिलकर ऐसा कुछ बनाएँगे,*
*जिसे आने वाली पीढ़ियाँ तोड़ना न चाहें,*
*बल्कि गर्व से संभालकर रखें?*

*आइए, अब केवल इमारतें नहीं—भविष्य बनाते हैं।*

*केवल पत्थर नहीं—पीढ़ियाँ तराशते हैं।*
*केवल इतिहास को याद नहीं करते—इतिहास रचने वाली पीढ़ी तैयार करते हैं।**

*गुरु नानक नाम, चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत का भला।*
*भुल चुक की हाथ जोड कर माफी चाहुंगा मन में बहुत दीनो से बसी बात साधं संगत के समक्ष रखा हुं*

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