नार्वे की लेडी पत्रकारने मचाया हंगामा;उसको किलो से गालियां;पर उसके समर्थकों की भीड़ बड़ी
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधान सेवक का विदेशी दौरों पर जाना अपने आप में एक उत्सव होता है। गोदी मीडिया ढोल-नगाड़े बजाकर बताता है कि कैसे 43 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री नॉर्वे की धरती पर कदम रख रहा है। लेकिन इस उत्सव के पीछे जो मौन का सन्नाटा पसरा होता है, उसकी कहानी कोई नहीं बताता। यह मौन इतना गहरा है कि इसमें लोकतंत्र की आवाजें दम तोड़ने लगती हैं। 15 जून 1983 को जब इंदिरा गांधी नॉर्वे गई थीं, तब उन्होंने वहां के प्रधानमंत्री के साथ बैठकर बकायदा प्रेस के सवालों का सामना किया था। लेकिन 43 साल में विकास इतना हुआ है कि अब हमारे प्रधानमंत्री को सवालों से परहेज है।
सवाल पूछना मना है: नॉर्वे का ब्रेकिंग न्यूज़ सन्नाटा
नॉर्वे के उस हॉल में जहाँ प्रधानमंत्री मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री यूनस स्टोर अपना बयान पढ़ रहे थे, वहां की हवा में पहले से ही यह तय कर दिया गया था कि कोई सवाल नहीं होगा। सोचिए, किसी भारतीय अधिकारी के लिए यह कितना गौरवशाली क्षण रहा होगा जब उसने दूसरे देश के अधिकारियों से मिन्नतें की होंगी कि देखिए, हमारे साहब आ रहे हैं, बस कोई पत्रकार सवाल न पूछ बैठे। लेकिन लोकतंत्र में कुछ ढीठ लोग भी होते हैं। नॉर्वे की पत्रकार हेलालिंग ने जैसे ही उस सन्नाटे को तोड़ते हुए पूछा कि प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया के सबसे आजाद प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेना चाहते?, तो मानो पूरे हॉल में बिजली कड़क गई। प्रधानमंत्री बिना जवाब दिए वहां से ऐसे निकले जैसे पीछे कोई भूत पड़ा हो। यह दृश्य दुनिया भर के लोकतांत्रिक मानस में एक सवाल बनकर ठहर गया है कि आखिर विश्वगुरु को एक पत्रकार से इतना डर क्यों लगता है?


योग, शून्य और वसुधैव कुटुंबकम का सुरक्षा कवच
हमारे तंत्र ने सवालों से बचने की एक अद्भुत कला विकसित कर ली है। जब भी कोई विदेशी पत्रकार मानवाधिकार, अल्पसंख्यकों या प्रेस की आजादी पर सवाल पूछता है, हमारे प्रतिनिधि तुरंत टाइम मशीन में बैठकर 5000 साल पुरानी संस्कृति की सैर पर निकल जाते हैं,। जब नीदरलैंड के पत्रकार ने पूछा कि वहां के प्रधानमंत्री ने भारत में मुस्लिम समुदाय और प्रेस फ्रीडम को लेकर चिंता जताई है, तो हमारे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा कि यह समझ की कमी के कारण है,। हेलालिंग ने जब मानवाधिकारों पर सवाल किया, तो उन्हें जवाब मिला योग और शून्य का आविष्कार भारत में हुआ था! अब कोई इन महानुभावों को समझाए कि शून्य का आविष्कार बेशक भारत में हुआ था, लेकिन उसका इस्तेमाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों की संख्या को ‘शून्य’ करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। यही हाल तब हुआ जब फरवरी 2025 में ट्रंप के साथ मुलाकात के दौरान एक पत्रकार ने अडानी के मुद्दे पर सवाल पूछ लिया। प्रधानमंत्री ने बड़े ही आध्यात्मिक भाव से वसुधैव कुटुंबकम का राग छेड़ दिया। सवाल भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत संबंधों पर था, और जवाब में पूरा विश्व एक परिवार बन गया! यह कटाक्ष नहीं तो और क्या है कि जब आप मुसीबत में फंसें, तो उपनिषदों की शरण ले लें।
प्रेस की आजादी: 157 वीं रैंक का उत्सव
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर की रैंकिंग में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। नॉर्वे नंबर वन पर है। प्रधानमंत्री के पास मौका था कि वे नॉर्वे की पत्रकार के सवालों का जवाब देकर इस रैंकिंग को गलत साबित कर देते, लेकिन उन्होंने मौन रहकर इसे और पुख्ता कर दिया। नॉर्वे के अखबारों ने उन्हें चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी तक कह डाला। वहां के अखबारों का कहना है कि मोदी ने अपने इर्द-गिर्द एक राजनीतिक कल्ट बना लिया है जिसने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी को कमजोर किया है। लेकिन भारत में क्या होता है? जैसे ही कोई पत्रकार सवाल पूछता है, हमारा ट्रोल सिस्टम सक्रिय हो जाता है। सबरीना सिद्दीकी ने जब 2023 में वाइट हाउस में सवाल पूछा, तो उन्हें उनके धर्म के आधार पर ट्रोल किया गया, जिससे वाइट हाउस को भी निंदा करनी पड़ी,। हेलालिंग को तो ट्विटर पर सफाई देनी पड़ी कि वे जासूस या विदेशी एजेंट नहीं हैं। भारतीय गोदी मीडिया के दौर में पत्रकारिता का धर्म अब सत्ता से सवाल पूछना नहीं, बल्कि सवाल पूछने वालों को देशद्रोही घोषित करना रह गया है।

जी-20 का वैन मॉडल और वियतनाम की आजादी
सवालों से भागने का यह पैटर्न इतना गहरा है कि जी-20 के दौरान जब जो बाइडन भारत आए, तो अमेरिकी पत्रकारों को एक वैन में बंद कर दिया गया ताकि वे मोदी-बाइडन की मुलाकात की तस्वीरें भी न ले सकें। अमेरिकी प्रेस सचिव को शर्मिंदा होकर कहना पड़ा कि हमने तो कोशिश की, अब भारत सरकार ही बताए कि ऐसा क्यों हुआ। स्थिति इतनी हास्यास्पद हो गई कि बाइडन को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए वियतनाम जाना पड़ा, क्योंकि वहां प्रेस कॉन्फ्रेंस करना भारत की तुलना में आसान था। लोकतंत्र की जननी (Mother of Democracy) के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है कि एक कम्युनिस्ट देश उससे बेहतर प्रेस की आजादी दे रहा है!
इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी और गिरती साख
वी-डेम (V-Dem) जैसी संस्थाएं भारत को चुनावी निरंकुशवाद’ (Electoral Autocracy) की श्रेणी में रख रही हैं। 2014 में जो भारत 65वें स्थान पर था, वह अब लुढ़क कर 105 पर आ गया है। लेकिन साहब को इसकी परवाह नहीं है। वे रैलियों में घंटों बोल सकते हैं, लेकिन एक भी ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकते जहां सवाल पहले से तय न हों,। राहुल गांधी का उदाहरण देते हुए यह तर्क दिया जाता है कि वे कम से कम सवालों का सामना तो करते हैं, चाहे वे 1984 के सिख दंगों पर ही क्यों न हों,। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री की विरासत शायद यह दर्ज करेगी कि 12 साल में उन्होंने एक भी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की।

निष्कर्ष: अखबार बंद कर दीजिए
अगर हमें लगता है कि प्रधानमंत्री का पत्रकारों से भागना सही है और इससे भारत की छवि खराब नहीं हो रही, तो हमें रवीश कुमार की उस सलाह पर गौर करना चाहिए: अपने घर आने वाला अखबार तुरंत बंद कर दीजिए। जब पत्रकार सवाल ही नहीं करेगा और सत्ता केवल अपना मन की बात सुनाएगी, तो उस रद्दी के पैसे देने का क्या फायदा? इतिहास चुपचाप दर्ज कर रहा है कि कैसे एक विश्वगुरु दुनिया के सामने अपना नैतिक बल खोता जा रहा है क्योंकि वह कुछ साधारण से सवालों का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा,। सांप्रदायिक राजनीति और नफरती बयानों से चुनाव तो जीते जा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र की उस पगड़ी को नहीं बचाया जा सकता जिसे आज सरेआम उछाला जा रहा है,। अंततः, यह मौन ही प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी विरासत बनेगी एक ऐसा माइक्रोफोन जो हमेशा चालू तो था, लेकिन कभी सवालों के लिए नहीं खुला।
